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एक नदी है,
जो मुझमें बहती है,
एक नदी है,
कभी मैं उसमें बहता हूँ,
रुकती नहीं,
झुकती हुई,
उभरती है,
कभी अपनी सी शांत,
कभी मुझ सी झुंझलाती,
कभी किनारों के पार जाती,
कभी हर सरहद में समाती,
एक मुझ सी नदी है,
एक नदी सा मैं हूँ!
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एक नदी है,
जो मुझमें बहती है,
एक नदी है,
कभी मैं उसमें बहता हूँ,
रुकती नहीं,
झुकती हुई,
उभरती है,
कभी अपनी सी शांत,
कभी मुझ सी झुंझलाती,
कभी किनारों के पार जाती,
कभी हर सरहद में समाती,
एक मुझ सी नदी है,
एक नदी सा मैं हूँ!
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जो चलता उसकी मर्ज़ी है,
और बिसात सब फ़र्ज़ी है,
उसकी हर चाल सटीक है,
बहते हुए चलो सब ठीक है।
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वो ना ख़त्म होते महीने चार
वो चार बार बार
जैसे साल हज़ार
चार महीने आस
चौदह साल बनवास
फिर पहले पाले से
फिर पहले दिवाले से
चक्कर वही घूमे बार बार
सितारों का चक्कर
या हारे का मुक़द्दर
कभी जीते तो सिकंदर
क्या बोले मस्त कलंदर
बस रुको महीने चार
फिर वहीं इंतज़ार
वो ना ख़त्म होते महीने चार
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अब के जब बरसे तो तुम नंगे पाँव आना,
दूब पे पड़ी बूँदों को अपने पाँव सहलाना,
फिर जो दिल करे बेझिझक करते जाना,
तुमको दूब बूँद का एहसास ख़ास होगा,
मेरा ख़याल होगा और मेरे ही पास होगा,
तुमसे बिछड़ा तो बादल ही तो बना हूँ मैं,
तुमसे मिलने को बूँद दूब बरस पड़ा हूँ मैं!
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उठो चलो येसु अब ना कोई कीलें गढ़ी हैं,
तुम्हारी सीखें यहाँ बेबस यूँ दलीलें पड़ी हैं,
तुम चढ़े सूली ना भागे कभी,
पर सोए हुए ना जागे कभी,
कितनी बार ‘या रब’ यूँ ज़िद्द पर अड़ी हैं,
उठो जाओ येसु यहाँ और सलीबें खड़ी हैं!
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तुम क्या आये बोझ सा ले आये,
बस जागे दिन रोज़ सा ले आये,
ना जश्न बस सोज़ सा ले आये,
तुम ना आये बोझ सा ले आये!
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