Friday, August 21, 2026

…नदी सा!

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एक नदी है,

जो मुझमें बहती है,

एक नदी है,

कभी मैं उसमें बहता हूँ,

रुकती नहीं,

झुकती हुई,

उभरती है,

कभी अपनी सी शांत,

कभी मुझ सी झुंझलाती,

कभी किनारों के पार जाती,

कभी हर सरहद में समाती,

एक मुझ सी नदी है,

एक नदी सा मैं हूँ!

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Wednesday, August 19, 2026

… सब ठीक है।

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जो चलता उसकी मर्ज़ी है,

और बिसात सब फ़र्ज़ी है,

उसकी हर चाल सटीक है,

बहते हुए चलो सब ठीक है।

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Thursday, May 7, 2026

…महीने चार!

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वो ना ख़त्म होते महीने चार

वो चार बार बार

जैसे साल हज़ार

चार महीने आस

चौदह साल बनवास

फिर पहले पाले से

फिर पहले दिवाले से

चक्कर वही घूमे बार बार

सितारों का चक्कर

या हारे का मुक़द्दर

कभी जीते तो सिकंदर

क्या बोले मस्त कलंदर

बस रुको महीने चार

फिर वहीं इंतज़ार

वो ना ख़त्म होते महीने चार

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Saturday, April 18, 2026

… बूँद दूब बरस!

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अब के जब बरसे तो तुम नंगे पाँव आना,

दूब पे पड़ी बूँदों को अपने पाँव सहलाना,

फिर जो दिल करे बेझिझक करते जाना,

तुमको दूब बूँद का एहसास ख़ास होगा,

मेरा ख़याल होगा और मेरे ही पास होगा,

तुमसे बिछड़ा तो बादल ही तो बना हूँ मैं,

तुमसे मिलने को बूँद दूब बरस पड़ा हूँ मैं!

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Sunday, April 5, 2026

…सलीबें खड़ी हैं!

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उठो चलो येसु अब ना कोई कीलें गढ़ी हैं,

तुम्हारी सीखें यहाँ बेबस यूँ दलीलें पड़ी हैं,

तुम चढ़े सूली ना भागे कभी,

पर सोए हुए ना जागे कभी,

कितनी बार ‘या रब’ यूँ ज़िद्द पर अड़ी हैं,

उठो जाओ येसु यहाँ और सलीबें खड़ी हैं!

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Saturday, March 21, 2026

…बोझ सा!

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तुम क्या आये बोझ सा ले आये,

बस जागे दिन रोज़ सा ले आये,

ना जश्न बस सोज़ सा ले आये,

तुम ना आये बोझ सा ले आये!

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Wednesday, March 11, 2026

…नाम में!

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खिंचे हुए दिन काम में,

बची कुची रातें नाम में!

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Tuesday, December 2, 2025

…परेशान होंगे!

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रोशनी को भी तो रोशन होने के अरमान होंगे,

कब तक ख़ुद जलो रोशन करो फ़रमान होंगे,

आतिश भी तो उसके बेपरवाह मेहमान होंगे,

अब तलक भी क्या वो ग़मों से अनजान होंगे,

अब रहने भी दो, जाने भी दो क्यों हैरान होंगे,

‘या रब’ कब तक गैरों ख़ातिर परेशान होंगे!

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Monday, December 1, 2025

… रोशन करो!

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रोशनी को भी तो रोशन होने के अरमान होंगे,

कब तक ख़ुद जलो रोशन करो फ़रमान होंगे।

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(Reply to Rumi’s you may be the light)




Saturday, November 8, 2025

…यार हैं!

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जो कुछ धागों से बंधे हुए हम यार हैं,

खिंचे खिंचे भी रहे पर साथ निसार हैं,

जो मुद्दतें हुई कहीं सुनी से भी पार हैं,

मिले तस्वीरों से पर साथ गुलज़ार हैं!

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Monday, October 13, 2025

…ज़िंदगी चाहिए!

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मुझको मेरी सी ही ज़िंदगी चाहिए,

मेरी ही ख्वाहिशें और मेरी ही जद्दोजहद,

मेरी ही हसरतें और मेरा ही वजूद चाहिए,

तुझसी ना अक्ल ना तौर तरीक़े मेरे,

मुझे ना तेरी तरकीब और सलीके चाहिए,

मुझको जो मेरे लिए सोची उसने,

मुझको जो मेरे लिए लिखी उसने,

वही आम सी बेनाम सी ज़िंदगी चाहिए,

मुझको मेरी सी ही ज़िंदगी चाहिए!

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Sunday, September 14, 2025

…सयाने मिलेंगे!

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हम सी मिट्टी के बने भी कहीं लोग मिलेंगे,

आधे मुरझाये फूल भी किसी बाग खिलेंगे,

सिर्फ़ वही जीने का तरीका किताबी नहीं,

हम सा जीने मे भी तो यूँ कुछ ख़राबी नहीं,

कहीं हम से भी राब्ता कुछ दीवाने मिलेंगे,

दीन दुनिया से बेख़बर कुछ सयाने मिलेंगे!

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Saturday, August 23, 2025

… भूले यारीयाँ!

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दिल-ओ-दिमाग़ की दीवारें घेरे हैं परछाइयाँ,

दीन-ओ-दुनिया की बातें भरे हैं गहराइयाँ,

मसरूफ़ियत के बहाने सभी भूले हैं यारीयाँ!

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Saturday, August 2, 2025

…कल देखेंगे!

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उनींदी आँखों भरे सवाल,

अब और क्या फिर हल देखेंगे,

चलो अब सो ही जाते हैं,

कल उठे तो फिर कल देखेंगे!

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Thursday, July 17, 2025

…पार जाएँगे!

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किस पहचान को पाकर जान पायेंगे,

तमगे ताज तिजोरी से पार कब पायेंगे,

नाम के पहले भी तो कोई बेनाम होगा,

उसको ढूँढो, उसके साथ ही पार जाएँगे!

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Wednesday, June 18, 2025

…या रब, यह सब!

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कैसे लिख लेते हो हालात यूँ ही दिल के,

कैसे कह देते हो हर बात यूँ ही मिल के,

कैसे उन जज़्बातों को हवा देते हो,

कैसे उन मुलाक़ातों को वफ़ा देते हो,

हज़ारों के हर ग़म मे शामिल हो जाते हो,

हज़रतों के करम के क़ाबिल हो जाते हो,

आख़िरी वक्त तक जी जान लगाते हो,

हौसला मुसलसल कहाँ से लाते हो?

कैसे लिख लेते हो ‘या रब’,

शायरी वायरी और यह सब!

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Monday, April 21, 2025

…प्रभु तैसे!

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बैठा सोचूँ काहू को कैसी,

मिली ज़िंदगी ऐसी वैसी,

राज काज काहू को कैसे,

मिले ठाठ बाट ऐसे वैसे,

मजबूरी काहू को पहाड़ जैसी,

मिले मजूरी अधूरी ऐसी वैसी,

लेटा सोचूँ काहे को ऐसे,

प्रभु चलाए मोहे जैसे तैसे!

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Friday, April 11, 2025

…संगमरमर की चादर!

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उनके कहने से मैं यहाँ संगमरमर की चादर ओढ़े लेटा हूँ,

वो अब भी मुझसे कहते हैं कि मेरे संग मर क्यों नहीं जाते,

सब दरवाज़े दरख़्तों से सख़्त हो गये हैं,

सब दीवारें खंडहर बेवक़्त हो गई हैं,

वो अब भी मुझसे कहते हैं कि मेरे संग घर क्यों नहीं आते!

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A passerby’s ode to Humayun’s Tomb

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Thursday, February 27, 2025

…बेकार इंतिज़ार!

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कितने भागते खपते खपाते,

कितने लहजों से बातें बनाते,

कितने लफ़्ज़ों मे मकसद बताते,

शाम तक आते सब दर किनार कर देते,

कितने हिसाब बही खाते बेकार कर देते,

शाम तक आते सब तेरा इंतिज़ार कर देते!

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Wednesday, February 19, 2025

…उसकी मर्जी!

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उस रोज़ की जद्दोजहद,

और इस रोज़ का जल जाना,

उस रोज़ की सिकश्त,

और इस रोज़ का समझ जाना,

उस रोज़ की हाए तौबा,

और इस रोज़ का यूँ सकूँ पाना,

हर रोज़ एक ही कोशिश,

उसकी मर्जी से ही चलते जाना!

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~ ~ ~ the seeker is sought ~ ~

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